मन की गाँठ नहीं खुलती हैं गुरुडम के गलियारे में ,
उसे खोलना है तो जानो दयानन्द के बारे में ।
दयानन्द थे युग निर्माता औ' वैदिक पथ के राही ,
ले मशाल वे निकल पड़े थे मावस के अन्धियारे में ।
टंकारा में जो टंकार हुई ,वह दुनिया में गूँजी,
और मलूसर आकर खुद ही सिमट गई अंगारे में ॥
रिषि कहते थे मन में छिपकर बैठा है जो परमेश्वर ,
नहीं मिलेगा वह मन्दिर में ,मस्जिद में ,गुरुद्वारे में ॥
धन दौलत औ ' माल खजाने सभी व्यर्थ हो जाएंगे ,मन का तार जुड़ेगा जब उस ईश्वर के इकतारे में ।
सूरज डूब रहा पश्चिम में,माला अभी अधूरी है ,
मोती सभी पिरोले बन्दे वेदों के उजियारे में ॥
आज सभी आदर्श मर गए,शिक्षाएँ भी लुप्त हुईं ,
दयानन्द के नाम रोटियाँ सिकती हैं चौबारे में ॥
ऊँची लहरें ,गहरा सागर ,नाविक सब मदहोश पड़े ,
संस्कारों की जर्जर नौका डूब रही मँझधारे में॥
युग की माँग यही है रिषिवर ,पुनः धरा पर आओ तुम ,
कब तक तुमको ढूँढेंगे हम नभ के किसी सितारे में ??
रचयिता डाॅ. किशोर काबरा ॥

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