।। ओ३म्।। 

मनुस्मृति - अध्याय 8/15-17 & 6/92 

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मों न हन्तव्यो मा न धर्मो हतोऽवधीत्।।

अर्थ ~ जो मनुष्य धर्म का हनन करता है,उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है,उसकी धर्म भी रक्षा करता है। अतः हमारे द्वारा नष्ट किया हुआ धर्म कभी हमें मार न डाले,इस भय से कभी भी धर्म का हनन अर्थात् त्याग न करना चाहिये।

वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम्।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद् धर्म न लोपयेत्।।

अर्थ ~ सुख की वर्षा करने वाला जो सब ऐश्वर्य का दाता धर्म है,उसका लोप करने वाले को विद्वान लोग नीच समझते हैं,इसलिये किसी भी मनुष्य को धर्म का लोप न करना चाहिये।

एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति।।

अर्थ ~ एक धर्म ही मनुष्य का ऐसा मित्र है जो मरने पर भी उसके साथ जाता है,अन्य सब सम्बन्ध तो शरीर के नाश होते ही समाप्त हो जाते हैं।

जिस धर्म की मनु महाराज इतनी प्रशंसा कर रहे हैं,उस धर्म के लक्षण निम्न बतलाये हैं --

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।

अर्थ ~ धैर्य,क्षमाशीलता,मन की वृत्तियों को रोकना,चोरी न करना,पवित्रता,इंद्रियों को अपने वश में रखना,शास्त्र का ज्ञान,आत्म-ज्ञान,सत्यभाषण और क्रोध को अपने वश में रखना ये धर्म के दस लक्षण हैं अर्थात् इन दस बातों को जीवन में धारण कर लेना ही मनुष्य के धार्मिक होने का प्रमाण है।

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