आजकल आर्य समाजियों का एक नया ट्रेंड देखने को मिलता है वेद परायण यज्ञ .किसी एक वेद के प्रथम मंत्र से लेकर अंतिम मंत्र तक सभी मन्त्रों से आहुति देने को वेद परायण यज्ञ कहते हैं.आइये आज हम लोग इस पर चर्चा करेंगे.
सर्वप्रथम यह देखें कि वेद क्या है और किसलिए है.वेद का अर्थ है ज्ञान और ज्ञान तो कर्म में परिणित करने के लिए है अतः हमें किसी भी कर्म को वेदानुसार अर्थात जानकर करना चाहिए.वेदों में अनेक स्थानों पर यज्ञों की चर्चा है जिनमें विधि परक मन्त्र भी हैं.जिनमे बताया गया है कि यज्ञ कैसे करें.हमारे पूर्वज मन्त्र दृष्टा ऋषियों ने उन मन्त्रों को जानकर अनेक ग्रंथों की रचना की जिनमें उन मन्त्रों की विस्तार पूर्वक व्याख्या की गयी है.महर्षि याज्ञवल्क्य ने तो शतपथ ब्राहमण नामक ग्रन्थ में यज्ञ की बड़ी सुन्दर और वैज्ञानिकता से परिपूर्ण व्यवस्था दी है.गोपथ आदि ब्राह्मण ग्रंथों तथा गृह सूत्रों में भी यज्ञों की व्यवस्था दी गयी है जिसके द्वारा विद्वान लोग यज्ञादि कर्मकांडों को कराते आये हैं.
उपरोक्त सभी ग्रंथों में कहीं वेद परायण यज्ञ का नाम तथा इसकी व्यवस्था का कोई भी अंश देखने को नहीं मिलता है.आर्य समाज के तीसरे नियम में भी वेद को पढना पढाना तथा सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म लिखा गया है.ऋषि दयानंद ने न तो वेद परायण यज्ञ करने या कराने का कोई संकेत दिया है और ऋषि दयानंद ने स्वयं भी अपने जीवन में कोई वेद परायण यज्ञ नहीं कराया.
ऋषि दयानंद जी पञ्च महायज्ञ विधि में दैनिक अग्निहोत्र विधि के अंत में लिखते हैं कि मंत्र के अंत में स्वाहा बोलकर जहाँ तक आहुति देने की इच्छा हो गायत्री मंत्र से होम करें.यह विशेष रूप से उन लोगों के जाने योग्य है जो यज्ञकुंड के आकार और आहुतियों की संख्या को आधार बनाकर अधिकाधिक यज्ञ करने हेतु वेद परायण यज्ञ की वकालत करते हैं.
कुछ विद्वानों से इस बारे में बात करने पर उन्होंने सख्ती से कहा कि हम करा तो रहे हैं तुम तो करते ही नहीं.अब सवाल ये है जब इसका कोई आदेश नहीं है तो मैं इसको क्यों करू.क्या जिन यज्ञों का आदेश और व्यवस्था दी गयी है उन सबको आपने किया.
जहाँ पर अश्वमेध यज्ञ की चर्चा आती है वहां स्पष्ट निर्देश है कि केवल चक्रवर्ती राजा को ही अश्वमेध यज्ञ करने का अधिकार है. तो वेद परायण यज्ञ करने का अधिकार किसको है और किसको नहीं यह कौन तय करेगा?
विचारणीय बिंदु यह है कि यदि सभी मन्त्रों से आहुति देने का विधान होता तो हमारे ऋषियों को अलग अलग संस्कारों के लिए अलग अलग मन्त्रों का संकलन रूपी पुरुषार्थ करने की क्या जरुरत थी? वे व्यवस्था दे सकते थे कि अमुक अमुक संस्कार में अमुक अमुक वेद के मन्त्रों से यज्ञ करना चाहिए.
जहाँ ऋषि दयानद ने वेद के पठन पाठन पर जोर दिया और वेदों के पढने के लिए पाठशालाएं भी खोली वहीँ यज्ञों तथा संस्कारों के करने के लिए पुरुषार्थ करके उनके विषय के अनुसार मन्त्रों का संकलन किया हालाँकि उस विषय से सम्बंधित वेद में और भी अनेक मंत्र हो सकते हैं किन्तु ऋषि ने केवल उन मन्त्रों का संकलन किया जिनकी संगति विषय के अनुसार लगती है.
सौभाग्य से अनेकों ऐसे विद्वान हमारे बीच में हैं जिनको लगता है कि उन्होंने ऋषित्व को धारण किया है.और अनेक कल्पित यज्ञों को कराने लगे हैं.मेरे भाइयों बहनों इस पाखंड से बाहर निकलिए और ऋषि का केवल अनुसरण कीजिये.ऋषि ने जिन यज्ञों तथा संस्कारों की व्यवस्था दी है उनको कराइए.विधिपूर्वक कराइए.ऋषियों की विधि को संपादित मत करिए उसमें अपनी तरफ से कुछ कम या ज्यादा मत करिए.लोग आपका सम्मान इसीलिए करते हैं क्योंकि आप ही समाज को ऋषियों के बताये मार्ग पर चलाते हैं.यदि आप लोग ही नया मार्ग बनाकर चलेंगे तो आपका अनुसरण करते हुए ऋषियों का मार्ग हमसे छूट जायेगा.और शायद फिर से हम गुरुडम और पाखंड के रास्ते पर चल पड़ेंगे.
याद रखिये पुरोहित का उद्देश्य केवल यजमान की ख़ुशी नहीं बल्कि यजमान का कल्याण होना चाहिए.अतः केवल यजमान की प्रसन्नता के लिए ऋषियों की दी हुयी विधि से इतर कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए.इसी में हम सबका कल्याण है.
(मैं यह जानता हूँ कि इस पोस्ट से अनेक लोगों कि आँखें खुलेंगी तो अनेक लोगों को थोडा कष्ट भी होगा.उन से मेरा निवेदन है कृपया तार्किक चर्चा करें अनर्गल प्रलाप न करें.वैसे भी आप लोग मेरे बारे में दुष्प्रचार खूब करते हो.यदि मैंने कुछ गलत लिखा हो तो कृपया उसको सुधार कराने की कृपा करें.)

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