ऋषि दयानन्द ने 4 जुलाई, सन् 1875 से 4 अगस्त, 1875 तक पूना में प्रवास किया और वहां 15 प्रवचन किये। महर्षि दयानन्द ने सभी प्रवचन हिन्दी में दिए थे। इन प्रवचनों को पहले हिन्दी से मराठी में अनुदित कर प्रकाशित किया गया था। इसके बाद इनका हिन्दी में अनुवाद तथा प्रकाशन हुआ। ऋषि दयानन्द के यह पन्द्रह प्रवचन ऋषि के समस्त साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। अष्टम से त्रयोदश उपदेश तक 6 उपदेश इतिहास विषय पर हैं तथा शेष अन्य विषयों पर। इस महत्ववपूर्ण ‘उपदेश मंजरी’ ग्रन्थ को अनेक प्रकाशकों ने प्रकाशित किया है। हमारे पास आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली, श्री घूड़मल प्रह्लादकुमार आर्य धर्मार्थ ट्रस्ट, हिण्डोनसिटी, परोपकारिणी सभा, अजमेर, दयानन्द संस्थान, दिल्ली, रामलालकपूर ट्रस्ट, बहालगढ़ आदि के अनेक संस्करण हैं। हमें आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट का संस्कार विशेष महत्वपूर्ण इसलिए लगता है कि इसमें पं. राजवीर शास्त्री जी कृत विस्तृत भूमिका, आर्य विद्वान व व्यवसायी श्री धर्मपाल आर्य जी का प्रकाशकीय तथा विस्तृत विषय-सूची दी गई है जो कि अन्यों में नहीं है।
आज हम इस आलेख में स्वामी दयानन्द जी के नियोग के पक्ष व भ्रूणहत्या के विरुद्ध विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं। भ्रूण-हत्या को उन्होंने ब्रह्महत्या रूपी पाप की संज्ञा दी है। वह कहते हैं कि ‘महाभारत में लिखा है कि व्यास जी ने विचित्रवीर्य की दोनों विधवा-स्त्रियों से नियोग किया था। मनु जी ने भी नियोग की आज्ञा दी है। प्राचीन आर्य लोगों में पति के जीते भी नियोग होता था, इसकी पुष्टि में महाभारत में लिखे हुए बहुत से उदाहरण दिये जा सकते है। व्यासजी बड़े पण्डित और धर्मात्मा थे, उन्होंने चित्रांगद और विचित्रवीर्य की स्त्रियों से नियोग किया और इनमें से एक के गर्भ से धृतराष्ट्र और दूसरी की कुक्षि से पाण्डु उत्पन्न हुए और यह पहले ही वर्णन हो चुका है कि पाण्डु की विद्यमानता में ही उनकी स्त्री ने दूसरे पुरुषों के साथ नियोग किया था। इस प्रकार नियोग का उस समय प्रचार था। पुनर्विवाह की अधिक आवश्यकता ही नहीं होती थी। अब इस समय में नियोग और पुनर्विवाह दोनों के बन्द होने से आज कल के आर्य लोगों में जो-जो भ्रष्टाचार फैला हुआ है, यह आप लोग देख ही रहे हैं। हजारों गर्भ गिराये जाते हैं, भ्रूण-हत्याएं होती हैं। एक गर्भ गिराने में एक ब्रह्म-हत्या का पाप होता है। सोचो कि इस देश में कितनी ब्रह्महत्यायें प्रतिदिन होती हैं? क्या कोई उनकी गणना कर सकता है? इन सब पापों का बोझ हमारे सिर पर है।’
नियोग आपद्धर्म है। सत्यार्थप्रकाश में इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इस विषय के जिज्ञासु इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश का अध्ययन कर जान सकते हैं। ऋषि दयानन्द जी ने भ्रूण-हत्या को ब्रह्म-हत्या माना है। किसी के अस्तित्व मिटा देने व उसे मारने की कुचेष्टा को हत्या करना कहते हैं। भ्रूण को यहां ऋषि ब्रह्म मान रहे हैं और भ्रूण-हत्या को ब्रह्म-हत्या बता रहे हैं। ऋषि दयानन्द अपने समय व अपने पूर्ववर्ती वैदिक विद्वानों की तुलना में वेदों के अद्वितीय विद्वान थे। उन्होंने यह बातें बहुत सोच विचार कर व शास्त्रों की साक्षी से कहीं हैं। किसी जीव को जन्म न लेने देना और जन्म से पूर्व ही उसकी हत्या कर व करा देना ब्रह्महत्या माना गया है। यह भ्रूणहत्या ब्रह्म-हत्या इसलिए भी है कि यह ईश्वर के कार्य व व्यवस्था में मनुष्यों द्वारा बाधा डालना है। यह ऐसा पाप है जिसका न तो कोई औचीत्य है और सम्भवतः इसका कोई प्रायश्चित भी नहीं हो सकता है। आर्यसमाज के विद्वानों को इस विषय को शिक्षित व आधुनिक जीवन शैली वाले समाज के सामने धनवान लोगों के सम्मुख तर्क, युक्ति व प्रमाणों के साथ रखना चाहिये जिससे यह पाप जड़ से समाप्त हो। बहुत से डाक्टर, पूर्ण प्रतिबन्धित होने पर भी, इस कार्य को छुप आर्थिक प्रलोभनों से कराते हैं जिसका अनावरण समय समय पर कुछ टीवी चैनलों द्वारा अपने स्टिंग आपरेशनों में किया जाता है। ऋषि के यह विचार उनके वेदों की विचारधारा के महत्व सहित भावी समय में बढ़ने वाले अमानवीय पाप को रोकने के लिए देशवासियों को आगाह करते अनुभव होते हैं।
पाठकों की जानकारी के लिए हमने ऋषि के इन विचारों को प्रस्तुत किया है। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य

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