सभी आर्य बंधुओं से निवेदन है कि आप सब यज्ञों में अवैदिक कार्यों से परहेज करें। जैसे यज्ञ के बाद बचे हुए घी को यज्ञकुंड में डालकर उस पात्र में जल डालकर उस जल के द्वारा तेजोअसि तेजो मयि धेहि मंत्र बोलकर उस जल से अंग स्पर्श करना। याद रखिये ऋषि दयानंद संस्कार विधि में सामान्य प्रकरण में लिखते हैं कि पूर्णाहुति करने के बाद हूत शेष यानि आहुति से शेष बचे हुये घृत को यजमान स्वयं जीम के अर्थात खाके तत्पश्चात उत्तम अन्न का भोजन करे। यानि जो घी आप बाद में यज्ञ कुण्ड में डाल देते हो उसको तो आपको खाना होता है। रही बात प्रार्थना की तो आपकी प्रार्थना आपके कर्म के अनुकूल होनी चाहिए। अगर आप बिना पढ़े पास होने की प्रार्थना करोगे तो पास नहीं हो पाओगे। इसी प्रकार ईश्वर से तेज और बल की प्रार्थना तो करो परन्तु उस जल को चेहरे पर और अन्य अंगों पर लगाने से बल और तेज नहीं मिलेगा वो तो तब मिलेगा जब आप ऋषि दयानन्द की आज्ञा को शिरोधार्य करके उस घी का सेवन करना आरम्भ करेंगे। आप ही बताइये घी को खाने से तेज और बल मिलता है या पानी को चेहरे पर चुपड़ने से ?
हालाँकि बचे हुए घी को यज्ञकुंड में डालने का कोई मंत्र भी ऋषि ने नहीं लिखा है परन्तु आज आर्य समाज में ऋषि से भी बड़े विद्वानो की कमी नहीं है जिन्होंने उस घी को डालने के मंत्र का भी आविष्कार कर दिया। ये लोग पहले तो वसो पवित्रमसि शतधारम् मंत्र से एक बार ही घी डलवा देते थे फिर प्रभु आश्रित जी की पद्धति को अपनाते हुए एक स्वर्गीय विद्वान ने (जो इस मंत्र का अर्थ भी नहीं बता पाये थे ) एक छलनी के द्वारा सैकड़ों धाराएं बनवाकर शेष बचे घी और उसमे अन्य पदार्थ डालकर आहुति करवाने लगे। मैंने जब पूछा तो कहने लगे की मंत्र कहता है की सैकड़ों धाराएं इसीलिए हम छलनी लगाकर घी की सैकड़ों धाराएं बनाकर आहुति दिलाते हैं।
अब इस मंत्र का अर्थ जानिए : वसो पवित्रमसि शतधारम् वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम। यानि हे प्रभु आप परम पवित्र हो तथा सैकड़ों हज़ारों वसुओं (वसु अर्थात जिनमे जीव बसते हैं जैसे पृथ्वी चन्द्र नक्षत्र आदि )को धारण करने वाले हो। जहाँ वेद मंत्र में धारम का अर्थ धारण करना है वहां इन्होने उसका अर्थ धाराएं बनाकर अनर्थ कर दिया।
अब यज्ञ करने और करने वाले अपने विवेक से काम लेकर यज्ञ करते हुए अपने जीवन को सार्थक करें।

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